निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए।
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा,
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीतभरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय-बयार पली!
मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिन्ता का भार बनी अविरल,
रजकण पर जल-कण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,
पद-चिह्न न दे जाता जाना।
प्रस्तुत पद्यांश का उचित शीर्षक बताइए?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → मैं नीरभरी दुःख की बदली
पद्यांश में कवयित्री स्वयं को बादल के रूप में प्रस्तुत करती है: “रजकण पर जल-कण हो बरसी”; इसलिए उचित शीर्षक मैं नीरभरी दुःख की बदली है।
अन्य विकल्प — सान्ध्य गीत, मैं सजग चिर साधना ले और पंकज-कली — पद्यांश के बदली वाले भाव से मेल नहीं खाते।