ऋतु वसंत का सुप्रभात था,
मंद मंद था अनिल बह रहा।
बालारुण की मृदु किरणें थीं,
अगल बगल स्वर्णिम शिखर थे।
एक दूसरे से विरहित हो,
अलग-अलग रहकर ही जिनको।
सारी रात बितानी होती,
निशा काल से चिर अभिशापित।
बेबस उस चकवा चकई का,
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें।
उस महान सरवर के तीरे,
शैवालों की हरी दरी पर।
प्रणय कलह छिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
पद्यांश के अनुसार चकवा-चकई का क्रंदन क्यों बंद हो गया ?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → रात बीत जाने की वजह से
चकवा-चकई को अलग रहकर “सारी रात बितानी होती” थी; सुप्रभात होने पर, अर्थात् रात बीतने पर, “बंद हुआ क्रंदन”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: ऋतु बीत जाने की वजह से — ऋतु (वसंत) तो चल रही है।
विकल्प 3: वियोग की वजह से — वियोग क्रंदन का कारण था, उसके बंद होने का नहीं।
विकल्प 4: वर्षा की वजह से — पद्यांश में वर्षा का उल्लेख नहीं है।