निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
इतने भले नहीं बन जाना साथी,
जितने भले हुआ करते हैं सर्कस के हाथी।
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत,सारी प्रतिभा,
किसी से कुछ लिया नहीं, न किसी को कुछ दिया।
ऐसा भी जिया तो जीवन क्या जिया ?
इतने दुर्गम मत बन जाना,
संभव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना।
अपने ऊँचे सन्नाटे में सिर धुनते रह गये,
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना।
इतने चालू मत हो जाना ताकि पड़े हमें शरमाना,
बगल दबी बोतल मुँह में जनता का अफ़साना।
ऐसे घाघ नहीं हो जाना,
बात नहीं हो मन की तो बस ऐसे मत तन जाना।
दुनिया देख चुके हो यारों, एक नज़र थोड़ी-सी अपने जीवन पर भी मारो,
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव, उस पर भी तो तनिक विचारो।
उपर्युक्त पद्यांश के अनुसार कविता में कवि किसका मर्म जानने को कह रहा है ?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → जीवन का
पद्यांश की पंक्ति: “लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना।”
अन्य विकल्प — कविता, किताबें और चिंता — के मर्म की बात पद्यांश में नहीं है।