निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
जो वस्तु जितनी ध्वंसकारिणी होती है, उसमें सर्जन-शक्ति भी उतनी ही छिपी रहती है। समाचार-पत्र जहाँ पल-भर में किसी भी राजसत्ता को ध्वंस कर सकता है, वहाँ उसमें यह शक्ति भी है कि वह किसी नवोदित राष्ट्र का सुघड़ सर्जन भी कर सके। समाचार-पत्र की शक्ति के इस पहलू को समझने के लिए हमें प्रथम यह देखना है कि राष्ट्र-निर्माण के लिए किन शक्तियों, प्रवृत्तियों और अवयवों की आवश्यकता है। देखा, यह गया है कि तानाशाही कभी भी किसी चिरंतन व्यवस्था-युक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं कर पाई है। स्वाभाविक बात है कि समाज के निर्माता जिन निर्माणकारी हितों को पहचान सकते हैं, साधारण जनता उन्हें उतनी शीघ्रता से नहीं पकड़ पाती। जनसाधारण की इसी दीर्घसूत्रता से निराश होकर महानुभाव सुधारों को ज़बरदस्ती लादकर राष्ट्र-निर्माण करने की योजनाएँ बनाते हैं। वे निर्माण का सारा उत्तरदायित्व अपने पर ही लेते हैं। जनशक्ति पर विश्वास न करके, केवल सत्ता के आदेश और शक्ति पर विश्वास करते हैं। ठीक है, राष्ट्र का निर्माण इस नीति से भी होता है, किंतु वह बहुत ही अस्थायी और अस्वाभाविक होता है: क्योंकि निर्माण का भार सँभालने वाली मूलशक्ति जनमानस हुआ करती है। तानाशाह जनमानस के जागरण को कोई महत्त्व नहीं देता। उसका निर्माण ऊपर से चलता है, किंतु यह लादा हुआ भार-स्वरूप निर्माण हो जाता है। सच्चा राष्ट्र-निर्माण वह है, जो जनमानस की तैयारी पर आधारित रहता है। योजनाएँ शासन और सत्ता बनाएँ, उन्हें कार्यरूप में परिणत भी करें, किंतु साथ ही उन्हें चिरस्थायी बनाए रखने एवं पूर्णतया उद्देश्य-पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि जनमानस उन योजनाओं के लिए तैयार हो। स्पष्ट शब्दों में हम कह सकते हैं, कि सत्ता राष्ट्र-निर्माण रूपी फसल के लिए हल चलाने वाले किसान का कार्य तो कर सकती है, किंतु उसे भूमि जनमानस को ही बनानी पड़ेगी।
गद्यांश के अनुसार सत्ता राष्ट्र-निर्माण रूपी फसल के लिए क्या कार्य कर सकती है?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → हल चलाने वाले किसान का
गद्यांश का अंतिम वाक्य: “सत्ता राष्ट्र-निर्माण रूपी फसल के लिए हल चलाने वाले किसान का कार्य तो कर सकती है, किंतु उसे भूमि जनमानस को ही बनानी पड़ेगी।”
अन्य विकल्प — सारथी, निर्माता और नेता — गद्यांश की इस उपमा से मेल नहीं खाते।