निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
ईंट-ईंट पर नाम लिखा है, जिनके खारे पसीने का,
उनको ही अधिकार नहीं है, इस नगरी में जीने का।
ऊँचे-ऊँचे भवन खड़े हैं, बादल से बतियाते हैं,
नींव जिन्होंने रखी उन्हीं को, दरवाज़े ठुकराते हैं।
सुबह-सवेरे सिर पर गारा, धूप में तपती काया है,
काँच-महल के हर कोने में, इनके श्रम की छाया है।
साँझ ढले फुटपाथों पर ही, फटी दरी बिछ जाती है,
चूल्हे की धुँधली लौ में फिर, आधी रोटी पक जाती है।
बच्चे पूछें — “बापू, अपना घर कब हम बनवाएँगे?”
बापू हँसकर कह देता है — “अगले बरस बसाएँगे।”
यह नगरी जगमग-जगमग है, पर उनका जीवन अँधियारा,
जिनके हाथों ने गढ़ डाला, शहर का हर कोना सारा।
‘बापू हँसकर कह देता है — “अगले बरस बसाएँगे।”’ पंक्ति का भाव है -
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → पिता अपनी विवशता को हँसी में छिपाकर बच्चों को आशा देता है
फुटपाथ पर आधी रोटी पर जीने वाला मज़दूर घर नहीं बना सकता, फिर भी वह हँसकर बच्चों को दिलासा देता है: “बापू हँसकर कह देता है — ‘अगले बरस बसाएँगे।’”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: धन जोड़ लिया है — घर में आधी रोटी पकती है; धन जोड़ने की कोई बात नहीं।
विकल्प 3: चिढ़कर टाल देता है — पिता हँसकर उत्तर देता है, चिढ़कर नहीं।
विकल्प 4: गाँव जाना चाहता है — पद्यांश में गाँव लौटने का कोई उल्लेख नहीं।