निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
अकेला व्यक्ति कितना भी परिश्रमी हो, कुछ काम ऐसे होते हैं जो उसके बस के नहीं होते। गाँव का कोई छोटा किसान अपनी थोड़ी-सी उपज लेकर मंडी जाता है तो उसे अक्सर वही दाम स्वीकार करना पड़ता है जो खरीदार तय कर दे। पर जब बहुत-से किसान मिलकर अपनी उपज एक साथ बेचते हैं, तो वे मोल-भाव करने की स्थिति में आ जाते हैं। सहकारिता का मूल विचार यही है कि साधारण लोग अपने छोटे-छोटे साधन जोड़कर वह शक्ति पा लें जो किसी एक के पास नहीं होती। दूध इकट्ठा करने वाली समितियाँ, बुनकरों और कारीगरों के संघ तथा बचत समूह इसी विचार पर चलते हैं।
सहकारिता केवल लाभ बाँटने की व्यवस्था नहीं है। इसमें हर सदस्य की बराबर की भागीदारी होती है और निर्णय मिल-बैठकर लिए जाते हैं। जहाँ सदस्य ईमानदारी से हिसाब रखते हैं और एक-दूसरे पर भरोसा बनाए रखते हैं, वहाँ समिति फलती-फूलती है। जहाँ कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए बाकी सदस्यों की अनदेखी करने लगते हैं, वहाँ यह ढाँचा धीरे-धीरे बिखर जाता है। इसलिए सहकारिता की सफलता नियमों से अधिक सदस्यों के आचरण पर टिकी है। एक कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता; सहकारिता इसी सीख को व्यवहार में उतारने का नाम है।
गद्यांश के अनुसार अकेले मंडी जाने वाले छोटे किसान को प्रायः क्या करना पड़ता है?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → खरीदार द्वारा तय किया गया दाम स्वीकार करना
गद्यांश में लिखा है: “उसे अक्सर वही दाम स्वीकार करना पड़ता है जो खरीदार तय कर दे।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: दूसरे किसानों के साथ मोल-भाव करना — मोल-भाव की स्थिति तब आती है जब बहुत-से किसान मिलकर उपज बेचते हैं, अकेले नहीं।
विकल्प 3: अपनी उपज बचत समूह को सौंपना — बचत समूह का उल्लेख सहकारी संस्थाओं के उदाहरण में है, मंडी के प्रसंग में नहीं।
विकल्प 4: समिति के नियमों के अनुसार दाम तय करना — अकेला किसान दाम तय नहीं करता; दाम खरीदार तय करता है।