प्रस्तुत पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पन्थ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।'
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी
अराति सैन्य सिन्धु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो, बढ़े चलो, बढ़े चलो।
उपर्युक्त पद्यांश का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → स्वतंत्रता की कामना
“स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती” — पूरी कविता में स्वतंत्रता ही वीर पुत्रों को आगे बढ़ने के लिए पुकार रही है; अतः कविता का केंद्रीय भाव स्वतंत्रता की कामना है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: जातीय चेतना — कविता में किसी जाति की चर्चा नहीं है।
विकल्प 3: साहस और वीरता — ये स्वतंत्रता पाने के साधन हैं, कविता का केंद्रीय भाव नहीं।
विकल्प 4: विजय भाव — विजय की प्रेरणा भी स्वतंत्रता के लिए दी गई है।