रामानंद के बारह प्रधान शिष्य हैं- रैदास, कबीर, धन्ना, सेना, पीपा, भवानन्द, सुखानंद, आशानन्द, सुरसुरानंद, परमानन्द, महानंद, श्रीआनंद। कहते हैं आनंद नामधारी शिष्य पहले रामानुज सम्प्रदाय के थे, बाद में उन्होंने रामानंद का साथ दिया। रामानंद के इन शिष्यों में से कई प्रसिद्ध कवि हो गये हैं। इनमें रविदास या रैदास और कबीरदास बहुत प्रसिद्ध हुए हैं। कई भक्तों के भक्तों ने इनके नाम पर अलग संप्रदायों का प्रवर्तन किया, जिनमें कबीरपंथी, खाकी, मलूकदासी, रैदासी, और सेना-पंथी बहुत प्रसिद्ध हैं। रामानंद स्वयं खान-पान के प्रश्न पर ही अपने मूल संप्रदाय से विच्युत हुए थे, अतएव वे अपने शिष्यों से उस प्रकार के आचार-विचार पर जोर नहीं दिलवाते थे। इसीलिए बाद के भक्तों में जाति-पांति का प्रश्न ही जाता रहा। रामानंद ने स्वयं रामचंद्र के अवतार और चरित्र को ही लोक और काल के उपयोगी बताया था। उपासना के क्षेत्र में ही वे जाति-पांति के बंधन को अस्वीकार करते थे पर अपने किसी भी व्यक्तिगत मत को उन्होंने शिष्यों पर लाद नहीं दिया। उनके मत से गुरु को आकाशधर्मा होना चाहिए जो पौधों को उन्मुक्तता दे, न कि शिलाधर्मी जो कि पौधे को अपने गुरुत्व से दबाकर उसका विकास ही रोक दे। जो विद्वान रामानंद-दिग्विजय आदि बाद के बने ग्रंथों के आधार पर रामानंद की इस महिमा को अस्वीकार करते हैं वे भूल जाते हैं कि सम्प्रदाय प्रतिष्ठा करने वाले शिष्य सदा लोक के साथ समझौता करके अपने गुरु के महत्व को कम किया करते हैं।
गद्यांश में प्रयुक्त 'आकाशधर्मा' शब्द का अर्थ है ?
Answer & explanation
Correct answer: option 3
सही उत्तर विकल्प (3) है → आकाश की तरह उन्मुक्तता देने वाला
गद्यांश में लिखा है: “गुरु को आकाशधर्मा होना चाहिए जो पौधों को उन्मुक्तता दे”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: अत्यंत विशाल और व्यापक — गद्यांश में आकाशधर्मा का अर्थ उन्मुक्तता देना है, विशालता नहीं।
विकल्प 2: अपने गुरुत्व से विकास को संकुचित करने वाला — यह शिलाधर्मी गुरु का लक्षण है।
विकल्प 4: आकाश की तरह घना और गतिशील — गद्यांश में ऐसा कहीं नहीं कहा गया।