जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
यह ब्यौपार तिहारो ऊधो, ऐसोई फिरि जैहै।।
पैलै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै।
दाख छाँड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै?
मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल है।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै?।। 24।।
उपर्युक्त पद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए।
प्रस्तुत पद की विषयवस्तु का संबंध है:
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → श्रीकृष्ण
पद भ्रमरगीत प्रसंग का है: गोपियाँ ऊधो के निर्गुण योग को ठुकराकर सगुण श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम प्रकट करती हैं — “सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै?”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: राम — पद में राम का प्रसंग नहीं है।
विकल्प 3: मीरा — पद सूरदास का है; इसमें गोपियाँ बोल रही हैं।
विकल्प 4: अयोध्या — प्रसंग ब्रज का है — “जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै”।