दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
कहानी की विधा, जो यूरोप से आई थी, प्रेमचंद के हाथों ठेठ भारतीय बन गई। उन्होंने उस विधा में भारतीय जीवन, उसका परस्पर विरोधी समकालीन यथार्थ एवं आदर्श और विकास, सब घुला-मिला दिया है। प्रेमचंद की कहानियाँ स्वाधीनता संग्राम के आदर्श से ओत-प्रोत हैं। उनके पात्रों और घटनाओं पर उस युग की समग्र चेतना का दबाव है। प्रेमचंद की बहुसंख्य कहानियों में आदर्शवाद पाया जाता है। उनका कथानक बोध के आधार पर विकसित होता है। उनके पात्रों में जो अन्तर्द्वन्द्व दिखाई पड़ता है वह स्थितियों के अनुरोध से है। आदर्शवाद उस युग के व्यवहार में भी दिखलाई पड़ता है। हजारों-लाखों लोग सत्याग्रह करते थे, जेल जाते थे, खद्दर पहनते थे, लोग सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा भी देते थे। अतः हृदय परिवर्तन उस युग के व्यवहार में यथार्थ बन गया था। 'नमक का दरोगा', 'इस्तीफ़ा', 'मेकू', 'परीक्षा' आदि कहानियाँ इसी तरह की हैं।
प्रेमचंद की संवेदना व्यापक एवं गंभीर थी। व्यापकता का लक्षण यह है कि उन्होंने समाज की सभी श्रेणियों के पात्र अपनी कहानियों के लिए चुने। गंभीरता का लक्षण यह है कि उन्हें कभी कहानी के अंत पर पहुँचने की अधीरता नहीं होती। प्रेमचंद की कहानियों में नारी विविध रूपों में आती है। इस दृष्टि से उनकी 'बूढ़ी काकी' कहानी अनुपम है। जो असहाय और हास्यास्पद हैं, उनकी मानसिकता को समझना महान रचनाकारों के ही बस की बात होती है।
प्रेमचंद की कहानियाँ किस आदर्श से ओत-प्रोत हैं?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → स्वाधीनता संग्राम से
गद्यांश कहता है: “प्रेमचंद की कहानियाँ स्वाधीनता संग्राम के आदर्श से ओत-प्रोत हैं।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: समग्र चेतना से — पात्रों और घटनाओं पर उस युग की समग्र चेतना का दबाव बताया गया है।
विकल्प 3: कथानक बोध से — उनका कथानक बोध के आधार पर विकसित होता है।
विकल्प 4: सत्याग्रह से — सत्याग्रह उस युग के व्यवहार में दिखने वाले आदर्शवाद का उदाहरण है।