ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग,
सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग।
तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।
हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक,
वीर खींचकर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।
पद्यांश में 'क्षत्रिय' का क्या गुण बतलाया गया है?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → उसमें निर्भयता की आग होती है
पद्यांश कहता है: “क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: वह श्रेष्ठ ज्ञानी होता है — 'श्रेष्ठ ज्ञानी' उसे कहा गया है जो ऊँच-नीच का भेद न माने।
विकल्प 3: वह तप करता है — तप-त्याग श्रेष्ठ ब्राह्मण का गुण बताया गया है।
विकल्प 4: वह त्याग करता है — यह भी ब्राह्मण का गुण है।