निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
समुद्र के किनारे जहाँ नदी का मीठा पानी खारे पानी से मिलता है और ज्वार-भाटे के साथ भूमि बार-बार डूबती और फिर उघड़ती है, वहाँ कुछ विशेष पेड़ उग पाते हैं। इन्हें मैंग्रोव कहा जाता है। साधारण पौधे खारे पानी में जल्दी मुरझा जाते हैं, पर मैंग्रोव ने ऐसी परिस्थितियों में जीना सीख लिया है। कई मैंग्रोव पेड़ों की कुछ जड़ें कीचड़ से ऊपर निकल आती हैं, जिनसे उन्हें साँस लेने में सहायता मिलती है, क्योंकि गीली दलदली मिट्टी में हवा बहुत कम होती है। कुछ पेड़ों के तनों से निकली जड़ें खंभों की तरह नीचे जाकर उन्हें सहारा देती हैं। कुछ प्रजातियों में बीज पेड़ पर लगे-लगे ही अंकुरित होने लगते हैं।
मैंग्रोव वन तट के रक्षक का काम करते हैं। इनकी घनी जड़ें लहरों की गति को धीमा कर देती हैं और तूफ़ान के समय तट पर पड़ने वाली मार को कम करती हैं। ये जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं और पानी के साथ बहकर आई गाद को रोक लेती हैं, जिससे तट का कटाव कम होता है। जड़ों के बीच का शांत, उथला पानी अनेक मछलियों, केकड़ों और झींगों के बच्चों को आश्रय देता है, इसलिए आसपास के मछुआरों की आजीविका भी इन वनों से जुड़ी रहती है। इसके बावजूद तटों पर निर्माण-कार्यों और तालाब बनाने के लिए इन्हें काटा जाता रहा है। एक बार नष्ट हो जाने पर इन्हें फिर से उगाना कठिन और धीमा काम है।
गद्यांश के अनुसार नष्ट हो चुके मैंग्रोव वनों के विषय में क्या सही है?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → उन्हें फिर से उगाना कठिन और धीमा काम है।
गद्यांश में लिखा है: “एक बार नष्ट हो जाने पर इन्हें फिर से उगाना कठिन और धीमा काम है।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: वे कुछ ही समय में अपने-आप फिर उग आते हैं। — गद्यांश इसके ठीक उलट बात कहता है।
विकल्प 3: उन्हें नदी का मीठा पानी नष्ट कर देता है। — मैंग्रोव तो वहीं उगते हैं जहाँ नदी का मीठा पानी खारे पानी से मिलता है।
विकल्प 4: उनके कटने का मछुआरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। — गद्यांश के अनुसार मछुआरों की आजीविका इन वनों से जुड़ी रहती है।