निम्नलिखित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उससे सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
शीश पर मंगल कलश रख, भूलकर जन के सभी दुख,
चाहते हो तो मना लो जन्मदिन भूखे वतन का।
जो उदासी है हृदय पर, वह उभर आती समय पर,
पेट की रोटी जुटाओ, रेशमी झंडा उड़ाओ,
ध्यान तो रखो मगर उस अधफटे नंगे बदन का।
तन कहीं पर, मन कहीं पर, धन कहीं, निर्धन कहीं पर,
फूल की ऐसी विदाई, शूल को आती रुलाई,
आंधियों के साथ जैसे हो रहा सौदा चमन का।
आग ठंडी हो, गरम हो, तोड़ देती है भरम को,
क्रांति है आनी किसी दिन, आदमी घड़ियाँ रहा गिन,
राख कर देता सभी कुछ अधजला दीपक भवन का।
इन पंक्तियों में कवि किसके दुःख से व्यथित है?
Answer & explanation
Correct answer: option 3
सही उत्तर विकल्प (3) है → भूख और अभाव से ग्रस्त जनता के दुःख से।
कवि “भूखे वतन”, “पेट की रोटी” और “अधफटे नंगे बदन” की बात करता है, अर्थात् भूख और अभाव से ग्रस्त जनता का दुःख।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: समस्त जनता के दुःख से। — कवि सब लोगों की नहीं, भूखे-नंगे लोगों की बात करता है।
विकल्प 2: शिष्ट जनों के दुःख से। — शिष्ट जनों का उल्लेख पद्यांश में नहीं है।
विकल्प 4: बीमार लोगों के दुःख से। — बीमारी की बात पद्यांश में नहीं है।