प्रस्तुत पद्यांश को पढ़कर सही विकल्प का चयन करें -
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो
अब घिस गईं समाज की तमाम नीतियाँ
अब घिस गईं मनुष्य की अतीत रीतियाँ
है दे रही चुनौतियाँ तुम्हें कुरीतियाँ
निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो
ज़ंजीर टूटती न कभी अश्रुधार से
दुःख – दर्द दूर भागते नहीं दुलार से
हटती न दासता पुकार से, गुहार से
इस गंग – तीर बैठ आज राष्ट्र-शक्ति की
तुम कामना करो, किशोर, कामना करो
जो तुम गये, स्वदेश की जवानियाँ गईं
चित्तौर के 'प्रताप' की कहानियाँ गईं
आज़ाद देश-रक्त की रवानियाँ गईं
अब सूर्य-चन्द्र से समृद्धि, ऋद्धि- सिद्धि की
तुम याचना करो दरिद्र, याचना करो
जिसकी तरंग लोल है अशांत सिन्धु वह
जो काटता घटा प्रगाढ़ बक्र इंदु वह
जो मापता समग्र सृष्टि दृष्टि-बिंदु वह
वह है मनुष्य जो स्वदेश की व्यथा हरे
तुम यातना हरो मनुष्य, यातना हरो
पद्यांश के अनुसार 'स्वदेश की व्यथा' क्या है?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → परतंत्रता
पद्यांश ज़ंजीर और दासता की बात करता है; इसलिए “वह है मनुष्य जो स्वदेश की व्यथा हरे” में स्वदेश की व्यथा परतंत्रता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: श्रृंगार रहित होना — 'सिंगार' की बात राष्ट्र को सँवारने की कल्पना के लिए आई है, व्यथा के रूप में नहीं।
विकल्प 3 और 4: अशिक्षा, लोकतंत्र का अभाव — इनका पद्यांश में उल्लेख नहीं है।