निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
कुम्हार का काम देखने में सरल लगता है, पर इसके पीछे लंबी साधना छिपी होती है। वह पहले तालाब या खेत से चिकनी मिट्टी लाता है, उसे सुखाकर कूटता है और छानकर कंकड़-पत्थर अलग कर देता है। फिर पानी मिलाकर उसे देर तक हाथों और पैरों से गूँधता है, ताकि मिट्टी में लोच आ जाए। इसके बाद वह मिट्टी का लोंदा चाक पर रखता है। घूमते चाक पर उसकी उँगलियों का हल्का-सा दबाव उस लोंदे को घड़े, सुराही या दीये का रूप दे देता है। ज़रा-सी असावधानी हो जाए तो बनता हुआ बर्तन टेढ़ा हो जाता है। कच्चे बर्तनों को छाया में सुखाकर आँवे में पकाया जाता है, तभी उनमें मज़बूती आती है।
मिट्टी के बर्तन बहुत समय से हमारे जीवन से जुड़े हैं। गर्मियों में घड़े का पानी ठंडा रहता है, क्योंकि उसकी दीवारों के बारीक छिद्रों से रिसा पानी भाप बनकर उड़ता रहता है। ये बर्तन टूटकर फिर मिट्टी में मिल जाते हैं, इसलिए धरती पर बोझ नहीं बनते। फिर भी प्लास्टिक और धातु के बर्तनों का चलन बढ़ने से कुम्हार के काम की माँग घटी है और कई परिवारों ने यह पुश्तैनी धंधा छोड़ दिया है। यदि हम त्योहारों पर दीये और गर्मियों में घड़े खरीदते समय कुम्हार को याद रखें, तो यह कला अपनी चमक नहीं खोएगी। कुम्हार केवल बर्तन नहीं गढ़ता, वह मिट्टी में अपना धीरज भी उतार देता है।
'वह मिट्टी में अपना धीरज भी उतार देता है' का क्या आशय है?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → कुम्हार का धैर्य और लगन उसके बर्तनों में झलकते हैं।
गद्यांश के आरंभ में ही कहा गया है: “कुम्हार का काम देखने में सरल लगता है, पर इसके पीछे लंबी साधना छिपी होती है।”
देर तक गूँधना, चाक पर सधा हुआ दबाव और ज़रा-सी असावधानी से बचना उसके धीरज को दिखाते हैं; यही धीरज उसके बर्तनों में उतर आता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: कुम्हार बर्तन बनाते समय मिट्टी में पानी मिलाता है। — पानी मिलाना एक चरण है; पंक्ति का आशय धीरज से है, पानी से नहीं।
विकल्प 3: कुम्हार मिट्टी के काम से जल्दी थक जाता है। — थकने की बात गद्यांश में नहीं है।
विकल्प 4: कुम्हार अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ना चाहता है। — धंधा छोड़ने की बात कई परिवारों के लिए कही गई है; इस पंक्ति से उसका संबंध नहीं।