निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
स्वच्छता को अक्सर सरकारी विभागों या सफ़ाईकर्मियों की ज़िम्मेदारी मान लिया जाता है। हम अपने घर का आँगन तो चमकाकर रखते हैं, पर दरवाज़े के बाहर कूड़ा फेंकते समय यह नहीं सोचते कि गली भी किसी की है। घर के बाहर की हर जगह को पराया मानने की यही सोच गंदगी की असली जड़ है। सड़क, नाली, पार्क और बाज़ार सबके साझे हैं, इसलिए उनकी देखभाल भी सबकी साझी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। कोई भी व्यवस्था, चाहे वह कितनी ही साधन-संपन्न क्यों न हो, तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक लोग स्वयं उसमें हाथ न बँटाएँ।
जहाँ मोहल्ले के लोग मिलकर पहल करते हैं, वहाँ बदलाव जल्दी दिखाई देता है। घर में ही गीले और सूखे कचरे को अलग रखना या बच्चों में शुरू से साफ़-सफ़ाई की आदत डालना छोटे काम लगते हैं, पर इन्हीं से वातावरण बनता है। जब कोई नागरिक किसी गंदे कोने को अपने हाथों से साफ़ करता है, तो उसे देखकर दूसरों को शर्म भी आती है और प्रेरणा भी मिलती है। धीरे-धीरे वह कोना पूरे मोहल्ले की चिंता बन जाता है। स्वच्छता किसी एक दिन का अभियान नहीं, रोज़ की आदत है। जिस दिन हम सार्वजनिक स्थान को भी अपने घर जैसा मानने लगेंगे, उस दिन सफ़ाई के लिए किसी नारे की ज़रूरत नहीं रहेगी।
गद्यांश के अनुसार कोई भी व्यवस्था कब तक सफल नहीं हो सकती?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → जब तक लोग स्वयं उसमें हाथ न बँटाएँ
गद्यांश में लिखा है: “कोई भी व्यवस्था, चाहे वह कितनी ही साधन-संपन्न क्यों न हो, तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक लोग स्वयं उसमें हाथ न बँटाएँ।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: जब तक उसके पास पर्याप्त साधन न हों — गद्यांश कहता है कि साधन-संपन्न व्यवस्था भी लोगों के बिना सफल नहीं होती।
विकल्प 3: जब तक सफ़ाई के नारे न लगाए जाएँ — गद्यांश के अनुसार अपनापन आने पर नारे की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।
विकल्प 4: जब तक हर गली में सफ़ाईकर्मी न हों — स्वच्छता को केवल सफ़ाईकर्मियों की ज़िम्मेदारी मानने को ही गद्यांश गलत ठहराता है।