निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
रीतिकाल में रीतिमुक्त कवियों की श्रृंगारिकता विशिष्ट प्रकार की है। रीतिमुक्त कवि 'प्रेम की पीर' के सच्चे गायक थे। इनके श्रृंगार में प्रेम की तीव्रता भी है एवं आत्मा की पुकार भी। घनानंद,आलम, ठाकुर, बोधा आदि की रचनाओं में इसे महसूस किया जा सकता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है - "श्रृंगार रस के ग्रंथों में जितनी ख्याति और जितना मान 'बिहारी सतसई' का हुआ उतना और किसी का नहीं। इसका एक-एक दोहा हिंदी में एक-एक रत्न माना जाता है। बिहारी ने इसके अतिरिक्त और कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। यही एक ग्रन्थ उनकी इतनी बड़ी कीर्ति का आधार है। मुक्तक कविता में जो गुण होना चाहिए, वह बिहारी के दोहों में उत्कर्ष को पहुँचा है, इसमें कोई संदेह नहीं। जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समाहार शक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से वर्तमान थी। इसी से वे दोहे ऐसे छोटे छंद में इतना रस भर सके। इनके दोहे क्या हैं रस के छोटे-छोटे छींटे हैं।" थोड़े में बहुत कुछ कहने की अद्भुत क्षमता को देखते हुए ही कहा गया है कि....
सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगे, घाव करै गंभीर।।
अर्थात जिस तरह नावक अर्थात तीरंदाज़ के तीर देखने में छोटे होते हैं, पर गंभीर घाव करते हैं, उसी तरह 'बिहारी सतसई' के दोहे देखने में छोटे लगते हैं, पर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।
गद्यांश के अनुसार बिहारी का केवल एक ही ग्रन्थ से ख्याति प्राप्त करने का क्या आधार था ?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → कल्पना व भाषा की समाहार शक्ति
गद्यांश के अनुसार मुक्तक की सफलता “कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समाहार शक्ति” पर निर्भर है, और “यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से वर्तमान थी।”
अन्य विकल्प — विद्वता, दरबारी होना और ईश्वरीय कृपा — गद्यांश में आधार के रूप में नहीं बताए गए।