निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढ़े मुंशीजी तो पहले ही से कुड़-बुड़ा रहे थे कि चलते-चलते इस लड़के को समझाया था लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढ़ापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है, और कोई ओहदेदार नहीं थे, लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे अँधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दीया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया। इसके थोड़े ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढ़े पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले—जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड़ लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाते तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृद्धा माता को भी दुःख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने तो कई दिनों तक सीधे मुँह से बात भी नहीं की।
गद्यांश के अनुसार वंशीधर को मुअत्तली का परवाना किस कारण मिला?
Answer & explanation
Correct answer: option 3
सही उत्तर विकल्प (3) है → कार्य-परायणता के कारण
गद्यांश में लिखा है: “कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला।”
वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था; उसी का मूल्य उन्हें चुकाना पड़ा।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: काम में लापरवाही करने के कारण — गद्यांश लापरवाही नहीं, कार्य-परायणता का दंड बताता है।
विकल्प 2: पिता की बात न मानने के कारण — यह पिता की शिकायत है; मुअत्तली का कारण यह नहीं बताया गया।
विकल्प 4: ओहदेदारों से झगड़ा करने के कारण — ओहदेदार का उल्लेख पिता की अपनी नौकरी के प्रसंग में है; किसी झगड़े की बात कहीं नहीं है।