निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। संध्या का समय था। बूढ़े मुंशीजी बैठे राम-नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिएँ बैलों की जोड़ी, उनकी गरदनों में नीले धागे, सीगें पीतल से जड़ी हुई। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे। मुंशीजी अगवानी को दौड़े। देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे, हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन-सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लड़का अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्यों मुँह छिपाना पड़ता? ईश्वर निस्संतान चाहे रखे, पर ऐसी संतान न दे।
अलोपीदीन ने कहा—नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए।
मुंशीजी ने चकित होकर कहा—ऐसी संतान को और क्या कहूँ?
अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा—कुलतिलक और पुरुषों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें?
गद्यांश के अनुसार मुंशीजी ने अपने लड़के को क्या कहा?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → अभागा कपूत
मुंशीजी कहते हैं: “किंतु क्या करें, लड़का अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्यों मुँह छिपाना पड़ता?”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: कुल का तिलक — 'कुलतिलक' शब्द अलोपीदीन के कथन में आया है, मुंशीजी के नहीं।
विकल्प 2: धर्मपरायण मनुष्य — धर्मपरायणता की बात भी अलोपीदीन ने कही है।
विकल्प 3: पूज्य देवता — मुंशीजी ने अलोपीदीन को “आप हमारे पूज्य देवता हैं” कहा था, लड़के को नहीं।