जाती हुई धूप संध्या की
सेंक रही है मां
अपना अप्रासंगिक होना
देख रही है मां
भरा हुआ घर है
नाती-पोतों से, बच्चों से
अनबोला बहुओं का बोले
बंद खिड़कियों से
इधर-उधर उड़ती सी नज़रें
फेंक रही है मां
फूली सरसों नहीं रही
अब खेतों में मन के
पिता नहीं हैं, अब नस-नस
क्या कंगन सी खनकें
रस्ता थकी हुई यादों का
छेंक रही है मां
'फूली सरसों नहीं रही' से अभिप्राय है -
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → मन में उल्लास का समाप्त होना
“फूली सरसों नहीं रही / अब खेतों में मन के” — मन के खेतों में अब सरसों नहीं फूलती, अर्थात् मन का उल्लास समाप्त हो गया है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: वृद्धावस्था की कठिनाई — पंक्ति मन की उमंग की बात करती है, शारीरिक कठिनाई की नहीं।
विकल्प 2 और 3: उमंग का भाव, मन का उल्लास से भरना — ये उलटा भाव बताते हैं; पंक्ति में उल्लास के न रहने की बात है।