निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥
निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि॥
पद्यांश के अनुसार सच्चा पंडित कौन है?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → जो प्रियतम का एक अक्षर पढ़ ले
पोथियाँ पढ़कर कोई पंडित नहीं बना; जो पीव (प्रियतम) का एक अक्षर पढ़ ले, वही पंडित है: “ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: जो अनेक पोथियाँ पढ़ ले — पोथी पढ़-पढ़कर तो जग मर गया, पंडित कोई न हुआ।
विकल्प 3: जो शास्त्रार्थ में सबको हरा दे — शास्त्रार्थ का कोई उल्लेख नहीं।
विकल्प 4: जो जीवन भर वेदों का पाठ करे — केवल पढ़ने को पद्यांश व्यर्थ बताता है।