निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए।
दिवसावसान का समय,
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुंदरी परी-सी
धीरे-धीरे-धीरे।
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर मधुर है दोनों उसके अधर-
किन्तु जरा गम्भीर, नहीं है उनमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक
गँधा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से
हृदयराज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता
किन्तु कोमलता की वह कली
सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अम्बर-पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग राग आलाप
नूपुरों में भी रुनझुन रुनझुन नहीं
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा 'चुप, चुप, चुप'
है गूँज रहा सब कहीं-
उक्त पद्यांश में किसने नीरवता के कंधे पर अपनी बाहें डाली हैं?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → संध्या सुंदरी
“सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह, छाँह-सी अम्बर-पथ से चली” — यह संध्या-सुंदरी के लिए कहा गया है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: तिमिरांचल — संध्या का अंधकार रूपी आँचल है।
विकल्प 3: अलसता — संध्या की उपमा में आया शब्द है (अलसता की-सी लता)।
विकल्प 4: मेघ — मेघमय आकाश से संध्या उतर रही है।