उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए।
निर्गुन कौन देस को बासी?
मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दे बूझति साँच, न हाँसी।।
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन, भेस है कैसा केहि रस के अभिलासी।।
पावेगो पुनि कियो आपनो जो रे! कहेगो गाँसी।।
सुनत मौन है रह्यो ठग्यो सो सूर सबे मति नासी।।
उपरोक्त पद्यांश में किस प्रकार के ईश्वर की वकालत हो रही है -
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → सगुण
गोपियाँ निर्गुण पर व्यंग्य करते हुए पूछती हैं: “को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?”; वे रूप, रंग और माता-पिता वाले सगुण ईश्वर की पक्षधर हैं।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: निर्गुण — निर्गुण की तो हँसी उड़ाई गई है।
विकल्प 3: मायावी — पद में इसका प्रसंग नहीं है।
विकल्प 4: मधुकर — यह उद्धव के लिए संबोधन है, ईश्वर का प्रकार नहीं।