जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
यह ब्यौपार तिहारो ऊधो, ऐसोई फिरि जैहै।।
पैलै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै।
दाख छाँड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै?
मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल है।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै?।। 24।।
उपर्युक्त पद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए।
'जोग' शब्द का आशय है:
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → योग साधना
“जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै” — जोग से आशय ऊधो द्वारा लाई गई निर्गुण की योग साधना है, जिसे गोपियाँ ठगी का सौदा मानती हैं।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: योगासन — केवल शारीरिक आसन; पद में निर्गुण की साधना की बात है।
विकल्प 3: टोना — ठगी (टोने) का भाव 'ठगौरी' शब्द में है।
विकल्प 4: कुल संख्या — गणित वाला योग (जोड़) यहाँ अभिप्रेत नहीं है।