निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिये - नाटक की तरह एकांकी में चरित्र अधिक नहीं होते। यहाँ पांच-छह से अधिक चरित्र नहीं होते। चरित्रों में भी केवल नायक की प्रधानता रहती है, अन्य चरित्र उसके व्यक्तित्व को अग्रसर करते हैं। यहाँ प्रतिनायक की कल्पना सामान्यतः नहीं रहती। नायक स्वयं अपने उत्थान - पतन के लिए उत्तरदायी है। एकांकी में विदूषक की कल्पना नहीं की जाती, क्योंकि एकांकी की कथावस्तु में इसके लिए स्थान ही नहीं होता। हास्य, व्यंग्य और विनोद का काम उसके चरित्रों के संवादों से ही चल जाता है। एकांकी के चरित्र को सजीव, व्यक्तिवादी और प्रभावशाली होना चाहिए। यहाँ चरित्र एक ऐसा बिंदु है, जो अपने चारों ओर वृत्त या घेरा बनाता जाता है। अतएव, घटनाओं के उत्थान - पतन की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। चरित्र का निर्माण उसके संस्कार, मनोविज्ञान और वातावरण के अनुसार होता है। प्राचीन नाटकों की तरह यहाँ नायक या पात्रों का कोई बना-बनाया साँचा नहीं होता। नायक के लिए सर्वगुणसंपन्न होना भी आवश्यक नहीं वह तो एक साधारण व्यक्ति है, जो साधारण लोगों की तरह सुख-दुःख के बीच जीवन बिताता है। अधिकतर एकांकियों में चरित्र की मानसिक स्थिति द्वंद्वात्मक होती है। उसे अंतर्द्वन्द्व और बाह्यद्वंद्व से संघर्ष करता हुआ दिखाया जाता है। |
गद्यांश के अनुसार चरित्र निर्माण के लिए इनमें से क्या आवश्यक नहीं है? |
संस्कार मनोविज्ञान वातावरण घटनाओं का उत्थान-पतन |
घटनाओं का उत्थान-पतन |
सही उत्तर विकल्प (4) है → घटनाओं का उत्थान-पतन |