निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
सौ वर्ष पूर्व कबीरदास हिन्दू और मुसलमान दोनों के कट्टरपन को फटकार चुके थे. पंडितों और मुल्लाओं की तो नहीं कह सकते पर साधारण जनता 'राम और रहीम' की एकता मान चुकी थी. साधुओं और फकीरों को दोनों दीन के लोग आदर और मान की दृष्टि से देखते थे. साधु या फ़कीर भी सर्वप्रिय वही हो सकते थे जो भेदभाव से परे दिखाई पड़ते थे. बहुत दिनों तक एक साथ रहते-रहते हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के सामने अपना-अपना हृदय खोलने लग गए थे, जिससे मनुष्यता के सामान्य भावों के प्रवाह में मग्न होने और मग्न करने का समय आ गया था. चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य और रामानन्द के प्रभाव से प्रेम-प्रधान वैष्णव धर्म का जो प्रवाह बंग देश से लेकर गुजरात तक बहा उसका सबसे अधिक विरोध शक्तिमत और वाममार्ग के साथ दिखाई पड़ा. शाक्त-मत-विहित पशुहिंसा, मन्त्र-तन्त्र तथा यक्षिणी आदि की पूजा वेद-विरुद्ध अनाचार के रूप में समझी जाने लगी. हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के बीच 'साधुता' का सामान्य आदर्श प्रतिष्ठित हो गया था. बहुत से मुसलमान फकीर भी अहिंसा का सिद्धांत स्वीकार करके मांस- भक्षण को बुरा कहने लगे थे. ऐसे समय में कुछ भावुक मुसलमान 'प्रेम की पीर' की कहानियां ले कर साहित्य के क्षेत्र में उतरे. ये कहानियां हिन्दुओं के ही घर की थी. इनकी मधुरता और कोमलता का अनुभव करके इन कवियों ने दिखला दिया कि एक ही गुप्त तार मनुष्य मात्र के हृदयों से होता हुआ गया है जिसे छूते ही मनुष्य सारे बाहरी रूपरंग के भेदों की ओर से ध्यान हटा एकत्व का अनुभव करने लगता है.
इनमें से किसे गद्यांश के अनुसार साधुता के सामान्य आदर्श के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → मन्त्र-तंत्र
गद्यांश में मन्त्र-तन्त्र को “वेद-विरुद्ध अनाचार” कहा गया है, इसलिए यह साधुता के आदर्श में नहीं आता।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: अहिंसा — मुसलमान फकीरों ने भी अहिंसा का सिद्धांत अपनाया।
विकल्प 3: भेदभाव से परे होना — सर्वप्रिय साधु वही थे जो भेदभाव से परे थे।
विकल्प 4: मधुरता और कोमलता का भाव — यह 'प्रेम की पीर' की कहानियों का गुण बताया गया है।