निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए प्रश्न का उत्तर दीजिए-
चैत का महीना था। गोधूलि बेला थी। गोपाल, केदार और हम रामसहर के 'पंचमंदिल' के ऊँचे चौतरे पर बैठे हुए थे। रसे-रसे हवा डोलती थी। आम के मंजराने, नीम के फूलने और महुए के गदराने से दसों दिशाएँ गमगमाती थीं। पास ही की घनी अमराई में कोयल कुहुकती थी - हम लोग जितना ही चिढ़ाते थे, वह उतना ही उभड़ती जाती थी। दिन-भर खेतों में दाना चुगकर अपने बसेरे पर आई हुई चिड़िया अपने अँखफोड़ बच्चों को पंखों के आँचर में छिपाकर चहचहाती थी। बस्ती के इर्द-गिर्द बाँसों के झुरमुट में गौरैया और छोटी मैना चहक रही थी। खेत-खलिहानों में बूढ़े-जवान किसान अपनी मौज से चैत की तान अलापते थे।
बड़े हुलास का समय था। ऐसा सुहाता था कि इतना भाता था कि - चैती बहार की मस्ती से मन नाच उठता था। पीपल, पाकड़ और नीम के लहलहे टूसे बड़े सुहावने देख पड़ते थे।
खेत खलिहानों में किसान क्या करते थे?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → चैत की तान अलापते
गद्यांश में कहा गया है: “खेत-खलिहानों में बूढ़े-जवान किसान अपनी मौज से चैत की तान अलापते थे।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: कठिन परिश्रम — गोधूलि बेला में किसान मौज में थे, परिश्रम का उल्लेख नहीं।
विकल्प 3: फागुन का गीत गाते — महीना चैत का है, किसान 'चैत' की तान अलाप रहे थे।
विकल्प 4: खेतों की मेड़ों पर बैठे रहते — गद्यांश में इसका उल्लेख नहीं।