प्रस्तुत पद्यांश को पढ़कर नीचे दिये हुए प्रश्न का उत्तर दीजिए:-
सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-अलग
परिवेश से पृथक
अपनों से कटा - बँटा
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा
उतना ही एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ही ढोता है,
चेहरे पर मुसकानें चिपका
मन ही मन रोता है।
ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो
जिससे मनुष्य
ठूंठ-सा खड़ा न रहे
औरों से घुले-मिले
किसी को साथ ले
किसी के संग चले
भीड़ में खो जाना
यादों में डूब जाना
अस्तित्व को अर्थ
जीवन को सुगंध देता है।
प्रस्तुत काव्यांश का प्रतीकार्थ हो सकता है-
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → मनुष्य के जीवन में ऊँचाई पाने पर भी सबका साथ न छोड़ने की ओर संकेत करती है।
पहाड़ के माध्यम से कवि मनुष्य से कहता है कि ऊँचाई के साथ “औरों से घुले-मिले / किसी को साथ ले / किसी के संग चले”; यही प्रतीकार्थ है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: पहाड़ की मजबूरी — यह शाब्दिक अर्थ है।
विकल्प 2: एकाकीपन का दुःख — यह काव्यांश का एक अंश भर है।
विकल्प 3: प्रकृति से जुड़ी — पहाड़ केवल प्रतीक है; विषय मनुष्य का जीवन है।