निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
मैं नदिया हूँ, पर्वत की बेटी, कल-कल गाती आती हूँ,
जो भी मिलता राह में मुझको, उसको गले लगाती हूँ।
प्यासे खेतों की प्यास बुझाकर, हरियाली बिखराती हूँ,
बदले में कुछ भी न माँगूँ, बस चलती ही जाती हूँ।
पत्थर ठोकर दें तो भी मैं, हँसकर राह बनाती हूँ,
काँटे-कंकड़ सब सह-सहकर, मीठा जल पहुँचाती हूँ।
गाँव-गाँव और नगर-नगर में, जीवन बनकर बहती हूँ,
सूरज तपे या आँधी आए, कभी न कुछ भी कहती हूँ।
मानव! तुम भी सीखो मुझसे, देने का यह सुख न्यारा,
जो बाँटे बिन गिने-तुले, वही जग में सबसे प्यारा।
मेरे तट पर दीप जलाकर, तुम मुझको माँ कहते हो,
फिर क्यों मेरे निर्मल जल में, कचरा भरते रहते हो?
पद्यांश के अनुसार कौन-सा कथन सही नहीं है?
Answer & explanation
Correct answer: option 3
सही उत्तर विकल्प (3) है → नदी धूप और आँधी के कष्ट की शिकायत करती है
नदी कोई शिकायत नहीं करती: “सूरज तपे या आँधी आए, कभी न कुछ भी कहती हूँ”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: ठोकर सहकर राह बनाना — यह सही कथन है: ‘पत्थर ठोकर दें तो भी मैं, हँसकर राह बनाती हूँ’।
विकल्प 2: खेतों की प्यास बुझाना — यह सही कथन है: ‘प्यासे खेतों की प्यास बुझाकर, हरियाली बिखराती हूँ’।
विकल्प 4: माँ कहकर दूषित करना — यह सही कथन है: ‘तुम मुझको माँ कहते हो’ फिर भी कचरा भरते हो।