नीचे दिए गए काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्न का सही विकल्प उत्तर रूप में छाँटिए:-
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है।
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है।।
'इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है' पंक्ति का आशय है:-
(A) मनुष्य को बहुत ऊँचाई तक यात्रा करनी चाहिए।
(B) आकाश में सैर करनी चाहिए।
(C) हमेशा ऊपर की ओर देखना चाहिए।
(D) पक्षियों की तरह आसमान में उड़ना चाहिए।
(E) अपने व्यक्तित्व को उच्चतम बनाना चाहिए।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → केवल (E)
“इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है” — यहाँ ऊँचा उठने का अर्थ है व्यक्तित्व और विचारों को ऊँचा बनाना, शरीर से ऊपर जाना नहीं।
(A) मनुष्य को बहुत ऊँचाई तक यात्रा करनी चाहिए। — गलत; यह पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है।
(B) आकाश में सैर करनी चाहिए। — गलत; यह भी शाब्दिक अर्थ है।
(C) हमेशा ऊपर की ओर देखना चाहिए। — गलत; पंक्ति ऊपर उठने की बात करती है, देखने की नहीं।
(D) पक्षियों की तरह आसमान में उड़ना चाहिए। — गलत; यह भी शाब्दिक अर्थ है।
(E) अपने व्यक्तित्व को उच्चतम बनाना चाहिए। — सही; यही पंक्ति का आशय है।