निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के उपयुक्त विकल्पों का चयन कीजिए -
जिस प्रकार धृतराष्ट्र ने लौह निर्मित भीम को अपने अंक में भरकर चूर-चूर कर दिया था, वैसे ही प्रायः पार्थिव व्यक्तित्व कल्पना-निर्मित व्यक्तित्व को खण्ड-खण्ड कर देता है। परन्तु इसे मैं अपना सौभाग्य समझती हूँ कि रवीन्द्र के प्रत्यक्ष दर्शन ने मेरी कल्पना प्रतिमा को अधिक दीप्त सजीवता दी, उसे कहीं से खंडित नहीं किया। पर उस समय कुतूहल का भाव ही अधिक था जो जीवन के शैशव का प्रमाण है। दूसरी बार जब उन्हें शांति निकेतन में देखने का सुयोग प्राप्त हुआ तब मैं अपना कर्मक्षेत्र चुन चुकी थी। वे अपनी मिट्टी की कुटी श्यामली में बैठे हुए ऐसे जान पड़े मानो काली मिट्टी में अपनी उज्ज्वल कल्पना उतारने में लगा हुआ कोई अद्भुत कल्पना शिल्पी हो। तीसरी बार उन्हें रंगमंच पर सूत्रधार की भूमिका में उपस्थित देखा। जीवन की संध्या बेला में शांति निकेतन के लिए उन्हें अर्थ-संग्रह में यत्नशील देख कर न कुतूहल हुआ ना प्रसन्नता, केवल एक गंभीर विषाद की अनुभूति से हृदय भर आया।
किसके प्रत्यक्ष दर्शन ने कल्पना प्रतिमा को दीप्त सजीवता दी ?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → रवींद्र
गद्यांश कहता है: “रवीन्द्र के प्रत्यक्ष दर्शन ने मेरी कल्पना प्रतिमा को अधिक दीप्त सजीवता दी”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: शांति निकेतन — वह स्थान जहाँ लेखिका ने उन्हें दूसरी बार देखा।
विकल्प 2: लेखिका — कल्पना प्रतिमा लेखिका के मन की है; दर्शन रवीन्द्र के हुए।
विकल्प 3: स्वप्न — गद्यांश में इसका उल्लेख नहीं है।