निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
गाँव में घर की दीवार केवल धूप और पानी से बचाने वाली ओट नहीं रही है। त्योहार, विवाह या फसल कटने के अवसर पर घर की स्त्रियाँ प्रायः मिट्टी से लिपी दीवारों पर चित्र बनाती आई हैं। इनके रंग अधिकतर आसपास से ही जुटाए जाते थे, जैसे मिट्टी, चूना, कोयला और फूल-पत्तियाँ। इन चित्रों में पेड़, पशु-पक्षी, सूरज-चाँद और देवी-देवताओं के साथ रोज़मर्रा का जीवन भी उतर आता है। इन्हें बनाने वालों ने किसी विद्यालय में चित्रकला नहीं सीखी; माँ से बेटी तक, देखकर और साथ बैठकर यह कला आगे बढ़ती रही। इसलिए इन चित्रों को केवल सजावट मान लेना भूल होगी। उनमें एक समुदाय की स्मृतियाँ, उसके विश्वास और उत्सव की भावना दर्ज रहती है।
मिट्टी की दीवार हर बरसात में थोड़ी-बहुत झड़ जाती है और उस पर बने चित्र भी धुँधले पड़ जाते हैं। पर इससे यह परंपरा रुकी नहीं। अगले उत्सव पर दीवार फिर लीपी जाती और उस पर नए चित्र बन जाते। यहाँ कला का मूल्य टिकाऊपन में नहीं, बार-बार रचे जाने में है। आज पक्के मकानों और बाज़ार के छपे चित्रों ने इस अभ्यास को कमज़ोर किया है। कुछ जगह ये चित्र अब कागज़ और कपड़े पर उतरकर बिकने भी लगे हैं। इससे कलाकारों को नई पहचान मिली है, पर यह प्रश्न भी उठता है कि घर-आँगन से कटकर यह कला अपना अर्थ कितना बचा पाएगी।
गद्यांश के अनुसार दीवारों पर चित्र बनाने की यह कला आगे कैसे बढ़ती रही?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → माँ से बेटी तक, देखकर और साथ बैठकर
गद्यांश में लिखा है: “इन्हें बनाने वालों ने किसी विद्यालय में चित्रकला नहीं सीखी; माँ से बेटी तक, देखकर और साथ बैठकर यह कला आगे बढ़ती रही।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 2: विद्यालयों में चित्रकला की शिक्षा के द्वारा — गद्यांश स्पष्ट कहता है कि यह कला विद्यालय में नहीं सीखी गई।
विकल्प 3: बाज़ार के छपे चित्रों की नकल करके — छपे चित्रों ने इस अभ्यास को कमज़ोर किया है, आगे नहीं बढ़ाया।
विकल्प 4: कागज़ और कपड़े पर चित्र बेचकर — चित्रों का बिकना आज की बात है; कला के पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने का तरीका यह नहीं बताया गया।