जाती हुई धूप संध्या की
सेंक रही है मां
अपना अप्रासंगिक होना
देख रही है मां
भरा हुआ घर है
नाती-पोतों से, बच्चों से
अनबोला बहुओं का बोले
बंद खिड़कियों से
इधर-उधर उड़ती सी नज़रें
फेंक रही है मां
फूली सरसों नहीं रही
अब खेतों में मन के
पिता नहीं हैं, अब नस-नस
क्या कंगन सी खनकें
रस्ता थकी हुई यादों का
छेंक रही है मां
कविता का मूल भाव क्या है?
Answer & explanation
Correct answer: option 3
सही उत्तर विकल्प (3) है → माँ का जीवन के ढलान पर जीवन-यापन करना
कविता में माँ “जाती हुई धूप संध्या की / सेंक रही है” और “अपना अप्रासंगिक होना / देख रही है” — अर्थात् कविता का मूल भाव जीवन की ढलान (वृद्धावस्था) पर माँ का जीवन-यापन है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: कवि की स्मृतियाँ — कविता कवि की नहीं, माँ की स्थिति पर केंद्रित है।
विकल्प 2 और 4: माँ की स्मृतियाँ, वृद्ध माँ की स्मृतियों में खुद को खोना — स्मृतियाँ कविता का एक अंश हैं; मूल भाव घर में माँ का अप्रासंगिक होता जीवन है।