निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
हम में से अधिकांश लोग मानते हैं कि दूसरों की सहायता करने के लिए धन या कोई विशेष साधन चाहिए। यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। किसी के लिए अपना थोड़ा-सा समय निकाल देना भी उतनी ही बड़ी सहायता हो सकती है। पड़ोस के किसी बच्चे को पढ़ा देना, किसी बीमार बुज़ुर्ग के लिए दवा ले आना या मोहल्ले की सफ़ाई में हाथ बँटाना ऐसे ही काम हैं। इनमें न कोई बड़ा खर्च होता है, न किसी पद की आवश्यकता होती है। ज़रूरत होती है केवल इच्छा की और उस इच्छा को निभाने के धैर्य की।
स्वयंसेवा का लाभ केवल उसी को नहीं मिलता जिसकी सहायता की जाती है। जो व्यक्ति सेवा करता है, उसका मन भी बदलता है। अपनी छोटी-छोटी परेशानियाँ उसे उतनी भारी नहीं लगतीं, क्योंकि वह दूसरों की कठिनाइयों को निकट से देख चुका होता है। उसमें सहनशीलता आती है और वह अलग-अलग स्वभाव के लोगों के साथ मिलकर काम करना सीखता है। फिर भी सेवा तभी सार्थक होती है जब उसमें दिखावा न हो। जो व्यक्ति केवल प्रशंसा पाने के लिए सेवा करता है, वह कठिन समय आते ही पीछे हट जाता है। सच्चा स्वयंसेवक अपने काम का प्रचार नहीं करता; वह चुपचाप वहाँ पहुँच जाता है जहाँ उसकी ज़रूरत होती है। समाज की बहुत-सी छोटी समस्याएँ ऐसे ही लोगों के कारण बिना शोर के सुलझ जाती हैं। इसलिए समय के दान को किसी दूसरे दान से छोटा नहीं समझना चाहिए।
गद्यांश का मूल आशय क्या है?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → बिना दिखावे के दूसरों को दिया गया समय भी मूल्यवान सेवा है।
गद्यांश समय देने को सहायता मानता है और कहता है: “सेवा तभी सार्थक होती है जब उसमें दिखावा न हो।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: दूसरों की सेवा के लिए पहले पर्याप्त धन जुटाना आवश्यक है। — लेखक इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं मानता।
विकल्प 2: सेवा का उद्देश्य समाज में प्रशंसा पाना होना चाहिए। — प्रशंसा के लिए की गई सेवा को गद्यांश टिकाऊ नहीं मानता।
विकल्प 3: समाज की बड़ी समस्याएँ केवल स्वयंसेवकों से ही सुलझती हैं। — गद्यांश छोटी समस्याओं के सुलझने की बात करता है।