निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
छपी हुई किताबों के आने से बहुत पहले से कहानियाँ मुँह-ज़बानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रही हैं। सर्दियों की रातों में अलाव के पास या गर्मियों में छत पर बिछी खाटों पर दादी-नानी जो कथाएँ सुनाती थीं, वे केवल मन बहलाने का साधन नहीं थीं। चतुर खरगोश और लालची राजा के बहाने बच्चों को सच और दया का पाठ मिल जाता था, और वह भी बिना किसी उपदेश के। कहानी सुनाने वाली हर बार उसमें थोड़ा-सा अपना कुछ जोड़ देती थी; कभी सुनने वाले बच्चे का नाम, तो कभी अपने गाँव की नदी। इसी कारण मौखिक कथा कभी जड़ नहीं होती। वह हर कहने वाले के साथ थोड़ी बदलती और नई होती चलती है।
आज बच्चों के हाथ में मोबाइल हैं और परिवार पहले की तरह साथ बैठकर बातें कम करते हैं। ऐसे में यह परंपरा धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही है। किसी कहानी के भुला दिए जाने के साथ केवल कथा ही नहीं जाती, बोली के मुहावरे और बुज़ुर्गों का अनुभव भी चला जाता है। कहानी सुनते हुए बच्चा अपनी कल्पना में पूरा जंगल और महल खुद रचता है, जबकि परदे पर उसे सब कुछ पहले से बना-बनाया मिलता है। इसलिए दादी-नानी की कहानियों को बचाने का अर्थ बच्चों की कल्पना-शक्ति को जीवित रखना भी है।
गद्यांश के अनुसार कहानी सुनने और परदे पर देखने में क्या अंतर है?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → सुनते समय बच्चा दृश्य खुद रचता है, जबकि परदे पर सब बना-बनाया मिलता है।
गद्यांश में लिखा है: “कहानी सुनते हुए बच्चा अपनी कल्पना में पूरा जंगल और महल खुद रचता है, जबकि परदे पर उसे सब कुछ पहले से बना-बनाया मिलता है।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: परदे पर बच्चा दृश्य खुद रचता है, जबकि सुनते समय सब बना-बनाया मिलता है। — यह गद्यांश की बात का ठीक उलटा है।
विकल्प 3: सुनी हुई कहानी कभी नहीं बदलती, जबकि परदे की कहानी बदलती रहती है। — गद्यांश के अनुसार मौखिक कथा तो बदलती और नई होती चलती है।
विकल्प 4: सुनते समय बच्चा जल्दी थकता है, जबकि परदे पर देर तक ध्यान लगाता है। — थकने या ध्यान लगाने की बात गद्यांश में नहीं है।