निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
उस समय तक राख ठंडी हो चुकी थी। सूरदास अटकल से द्वार की ओर झोंपड़े में घुसा; पर दो-तीन पग के बाद एकाएक पाँव भूबल में पड़ गया। ऊपर राख थी, लेकिन नीचे आग। तुरंत पाँव खींच लिया और अपनी लकड़ी से राख को उलटने-पलटने लगा, जिससे नीचे की आग भी जल्द राख हो जाए। आध घंटे में उसने सारी राख नीचे से ऊपर कर दी, और तब फिर डरते-डरते राख में पैर रखा। राख गरम थी, पर असह्य न थी। उसने उसी जगह की सीध में राख को टटोलना शुरू किया, जहाँ छप्पर में पोटली रखी थी। उसका दिल धड़क रहा था। उसे विश्वास था कि रुपये मिलें या न मिलें, पर चाँदी तो कहीं गई ही नहीं। सहसा वह उछल पड़ा, कोई भारी चीज़ हाथ लगी। उठा लिया; पर टटोलकर देखा, तो मालूम हुआ ईंट का टुकड़ा है। फिर टटोलने लगा, जैसे कोई आदमी पानी में मछलियाँ टटोले। कोई चीज़ हाथ न लगी। तब तो उसने नैराश्य की उतावली और अधीरता के साथ सारी राख छान डाली। एक-एक मुट्ठी राख हाथ में लेकर देखी। लोटा मिला, तवा मिला, किंतु पोटली न मिली। उसका वह पैर, जो अब तक सीढ़ी पर था, फिसल गया और अब वह अथाह गहराई में जा पड़ा। उसके मुख से सहसा एक चीख निकल आई। वह वहीं राख पर बैठ गया और बिलख-बिलखकर रोने लगा। यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी। अपनी बेबसी का इतना दुःख उसे कभी न हुआ था।
गद्यांश के अनुसार राख टटोलते समय सूरदास को किस बात का विश्वास था?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → रुपये मिलें या न मिलें, चाँदी तो कहीं नहीं गई होगी
गद्यांश में लिखा है: “उसे विश्वास था कि रुपये मिलें या न मिलें, पर चाँदी तो कहीं गई ही नहीं।”
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: पोटली छप्पर के साथ उड़कर कहीं दूर जा गिरी होगी — गद्यांश के अनुसार वह उसी जगह की सीध में राख टटोल रहा था, जहाँ छप्पर में पोटली रखी थी।
विकल्प 2: रुपये तो अवश्य मिलेंगे, चाँदी चाहे न मिले — यह कथन उलटा है; संदेह रुपयों पर था, भरोसा चाँदी पर।
विकल्प 3: पोटली ईंटों के नीचे दबकर सुरक्षित बच गई होगी — ईंट का टुकड़ा केवल हाथ लगा था; पोटली के ईंटों के नीचे दबने की बात गद्यांश में नहीं है।