निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए॥
पद्यांश के अनुसार योग की बात सुनकर कैसा लगता है?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → कड़वी ककड़ी के समान
योग की बात करुई (कड़वी) ककरी (ककड़ी) जैसी अप्रिय लगती है: “सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी”।
अन्य विकल्प — मीठा फल, शीतल जल और मधुर गीत — सब सुखद वस्तुएँ हैं, जबकि पद्यांश में योग को कड़वा और अरुचिकर बताया गया है।