गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिये -
जैन धर्म की दो बड़ी विशेषताएं अहिंसा और तप हैं। इसलिए यह अनुमान तर्क-सम्मत लगता है कि अहिंसा और तप की परम्परा प्राग्वैदिक थी और उसी का विकास जैन धर्म में हुआ। यह बात जैन धर्म के इतिहास से भी प्रमाणित होती है। महावीर वर्धमान ई.पू. छठी शताब्दी में हुए और उन्होंने जैन मार्ग का जोरदार संगठन किया। इससे उस मार्ग के प्रधान नेता वे ही समझे जाने लगे किन्तु जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर हुए और महावीर वर्धमान महज चौबीसवें तीर्थंकर थे। उनसे पूर्व तेईस तीर्थंकर और हुए थे। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे जो ऐतिहासिक पुरुष हैं और जिनका समय महावीर और बुद्ध, दोनों में से कोई 250 वर्ष पहले पड़ता है। वैराग्य और तपश्चर्या के जिस मार्ग पर उपनिषद जोर देते थे वह जैनों का भी मार्ग था (यद्यपि जैन मार्ग उन दिनों नहीं निकला था) और इस पंथ के श्रमण उपनिषदों के युग में भी बहुत अधिक संख्या में फैल रहे थे।
उपनिषद किस मार्ग पर जोर देते हैं?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → वैराग्य और तपश्चर्या