निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
अट नहीं रही है
आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।
पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।
पद्यांश के अनुसार किसकी शोभा तन में समा नहीं रही है?
Answer & explanation
Correct answer: option 1
सही उत्तर विकल्प (1) है → फागुन की आभा
पद्यांश में स्पष्ट कहा गया है कि फागुन की आभा इतनी अधिक है कि वह तन में समा नहीं रही: “आभा फागुन की तन सट नहीं रही है”।
अन्य विकल्प — सावन की घटा, शरद की चाँदनी और कोयल की कूक — इनका पद्यांश में कहीं उल्लेख नहीं है।