निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
पहली बारिश की रात ढली, भोर हुई मुसकाती,
भीगी मिट्टी की सोंधी गंध, हर साँस में घुल जाती।
कंधे पर हल, हाथों में बीज, चला खेत को किसान,
पूरब के माथे पर चमका, सोने-सा सूरज महान।
पगडंडी पर पाँव धँसे, कीचड़ ने रोका-टोका,
पर मन में जो सपना जागा, उसको किसने कब रोका।
मेड़-मेड़ पर मेंढक बोले, झींगुर ने तान लगाई,
धरती ने ज्यों आँखें खोलीं, हरियाली ने ली अँगड़ाई।
बैलों की घंटी की रुनझुन, नया गीत है गाती,
श्रम की बूँदें माथे पर, मोती-सी झिलमिलातीं।
सूखे बीते दिन भूलकर, उसने धरती को चूमा,
आशा का बादल बनकर, मन उसका जी भर झूमा।
बीज नहीं, वह बो रहा है, सबका आने वाला कल,
उसके श्रम से ही लहराएँगे, धान-भरे ये खेत सकल।
पद्यांश के अनुसार खेत की ओर जाते किसान को राह में किस कठिनाई का सामना करना पड़ा?
Answer & explanation
Correct answer: option 3
सही उत्तर विकल्प (3) है → कीचड़ भरी पगडंडी
पहली बारिश के बाद पगडंडी पर कीचड़ था जिसमें पाँव धँस रहे थे: “पगडंडी पर पाँव धँसे, कीचड़ ने रोका-टोका”।
अन्य विकल्प — तेज़ धूप, उफनती नदी और आँधी-तूफ़ान — का पद्यांश में कोई उल्लेख नहीं; भोर का सूरज तो ‘सोने-सा’ बताया गया है।