निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दीजिए।
अबिगत गति कछु कहति न आवै!
ज्यों गूंगो मीठे फल कौ रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जुं निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कौ अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं, तातें सूर सगुन लीला पद गावै॥
'अबिगत' से कवि का आशय किससे है?
Answer & explanation
Correct answer: option 4
सही उत्तर विकल्प (4) है → निराकार ब्रह्म से
अबिगत (अविगत) का अर्थ है जो जाना न जा सके; कवि इससे निर्गुण-निराकार ब्रह्म की बात करता है, जिसकी गति “कछु कहति न आवै”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: साकार ब्रह्म से — साकार (सगुण) रूप की लीला का गान कवि अंत में अपनाता है: “सूर सगुन लीला पद गावै”।
विकल्प 2 और 3: राम से, कृष्ण से — ये सगुण रूप हैं; 'अबिगत' निराकार के लिए आया है।