निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित अगले पाँच प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
मिट्टी का नन्हा दीया जलता है चुपचाप,
न कोई शिकायत करता, न करता कोई विलाप।
तिल-तिल कर जलती है उसकी बाती,
बूँद-बूँद कर घटता है उसका तेल,
फिर भी उसकी लौ झिलमिल-झिलमिल
खेलती रहती है उजाले का खेल।
वह नहीं पूछता, किसकी है यह कुटिया,
महल हो या झोंपड़ी, सबको बाँटता समान उजियारा।
आँधी से लड़ता है, काँपता है, पर बुझता नहीं,
अँधेरे के आगे वह कभी झुकता नहीं।
सेवा का अर्थ यही दीया हमें सिखाता है,
जो औरों के लिए जलता है, वही सचमुच जगमगाता है।
अपने सुख की चिंता छोड़, दूसरों की राह सजाना,
स्वयं मिटकर भी जग को रोशनी दे जाना —
यही है जीवन का सच्चा धर्म,
यही है मानव का सबसे सुंदर कर्म।
पद्यांश का केंद्रीय भाव है -
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → निःस्वार्थ सेवा और त्याग की महिमा
स्वयं मिटकर दूसरों को रोशनी देना ही पद्यांश का मूल संदेश है: “स्वयं मिटकर भी जग को रोशनी दे जाना — यही है जीवन का सच्चा धर्म”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: दीपावली — पद्यांश में किसी उत्सव का उल्लेख नहीं।
विकल्प 3: भय — दीया आँधी और अँधेरे से डरता नहीं, लड़ता है।
विकल्प 4: दीये बनाने की कला — ‘मिट्टी का दीया’ केवल परिचय है, विषय नहीं।