निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए और सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो, परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
कवि किससे नहीं डरने का आह्वान कर रहा है?
Answer & explanation
Correct answer: option 2
सही उत्तर विकल्प (2) है → मृत्यु
पद्यांश कहता है: “विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी”।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प 1: विचार — कवि 'विचार लो' कहकर सोचने को कहता है।
विकल्प 3: मर्त्य — अर्थ: मरणशील; कवि याद दिलाता है कि हम मर्त्य हैं।
विकल्प 4: मनुष्य — कवि मनुष्य के लिए मरने की प्रेरणा देता है।