निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिये। दर्शन का चरम लक्ष्य सत्य या अंतिम सत्य की खोज करना होता है, पर अंतिम सत्य के संबंध में भी दार्शनिकों के मुख्यतः दो वर्ग रहे हैं - एक, जो किसी सूक्ष्म सत्ता या परोक्ष शक्ति को जिसे परमात्मा का भी नाम दिया जाता है- अंतिम सत्य या शाश्वत तत्व मानते हैं, जबकि दूसरे वर्ग में वे आते हैं, जो इस स्थूल एवं भौतिक जगत् को ही सृष्टि का आधारभूत तत्व एवं सत्व मानते हैं। इन्हें क्रमशः आदर्शवादी एवं यथार्थवादी कहा जाता है। प्लेटो प्रथम वर्ग में आ हैं। वे मानते थे कि इस भौतिक जगत् के पीछे किसी सूक्ष्म, शाश्वत एवं अलौकिक जगत् का आधार है या यों कहिए कि वह जगत् किसी आध्यात्मिक लोक की प्रतिच्छाया है, अतः यह जगत् और इसके पदार्थ मिथ्या हैं, जबकि उनका वास्तविक रूप विचार रूप में अध्यात्म-लोक में विद्यमान है। इस सृष्टि का निर्माण किसी अलौकिक शक्ति या परमात्मा के विचारों के अनुसार हुआ- अतः विचार ही मूल तत्व है जबकि वस्तु मिथ्या है। प्लेटो के अनुसार इस संसार में जितनी वस्तुएं हैं, वे सभी विचाररूप में अलौकिक जगत् में विद्यमान हैं। सांसारिक पदार्थ अपूर्ण, परिवर्तनशील एवं नाशवान् हैं, अतः वे मिथ्या हैं जबकि अलौकिक जगत में विद्यमान उनका विचार या प्रत्यय अपरिवर्तनीय एवं शाश्वत होने के कारण- सत्य है। |
दर्शन का चरम लक्ष्य हैः- |
अंतिम सत्य की खोज स्थूल एवं भौतिक जगत की खोज यथार्थ समाज की खोज मिथ्या जगत की खोज |
अंतिम सत्य की खोज |
सही उत्तर विकल्प (1) है → अंतिम सत्य की खोज |