निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए: पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार कुछ सोते - कुछ जागते चले आ रहे थे। अचानक गाड़ीवानों ने घबराए हुए आकर उन्हें जगाया और बोले- महाराज! दारोगा ने गाड़ियाँ रोक दी हैं और घाट पर खड़े आपको बुला रहे हैं। पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मी जी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या! स्वर्ग में भी लक्ष्मी का राज है। उनका कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं वैसे ही नचाती हैं। लेटे-ही-लेटे गर्व से बोले - चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडित जी ने बड़ी निश्चिन्तता से पान के बीड़े को उठाकर कर खाया। फिर लिहाफ ओढ़े हुए दारोगा के पास आकर बोले- बाबू जी आशीर्वाद ! कहिए, हमसे ऐसा कोन सा अपराध हुआ कि गाड़ियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए। वंशीधर रुखाई से बोले- सरकारी हुक्म पंडित अलोपीदीन ने हंसकर कहा हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को, हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं क्या? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढ़ाएं। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पड़ा। ईमानदारी की नई उमंग थी। कड़ककर बोले- हम उन नमकहरामों में नहीं हैं जो कौड़ियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। कायदे के अनुसार आपका चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है। जमादार बदलू सिंह ! तुम इन्हें हिरासत में ले लो, मैं हुक्म देता हूँ। |
अलोपीदीन किस पर अखंड विश्वास करते हैं? |
धन कानून दारोगा गाड़ीवान |
धन |
सही उत्तर विकल्प (1) है → धन |