निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए - काव्य की आत्मा के सम्बन्ध में हमारे यहाँ छः प्राचीन संप्रदाय प्रचलित हैं - रस संप्रदाय, अलंकार संप्रदाय, रीति संप्रदाय, वक्रोक्ति संप्रदाय, ध्वनि संप्रदाय और औचित्य संप्रदाय। रस संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि थे। यद्यपि उन्होंने काव्य की आत्मा सम्बन्धी वाद-विवाद में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया, किन्तु उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से काव्य का उद्देश्य पाठक को रसानुभूति प्रदान करना बताया है। काव्य की वह शक्ति जिससे रस की निष्पत्ति होती है, वही काव्य की आत्मा है। काव्य में यह शक्ति भावनाओं के चित्रण द्वारा उत्पन्न होती है। अतः रस-सिद्धांत के अनुयायी भाव, भावनाओं और उनसे सम्बंधित विभिन्न अंगों - विभाव, अनुभावादि को ही काव्य का प्राण मानते हैं। संक्षेप में रस-संप्रदाय के अनुसार काव्य की आत्मा उसकी भावोत्पादिनी शक्ति है। ध्यान रहे, भावनाओं का वर्णन इस ढंग से भी किया जा सकता है कि पाठक उससे जरा भी प्रभावित न हो, ऐसी स्थिति में वह वर्णन काव्य का रूप धारण नहीं कर सकेगा। इसीलिए रस सिद्धांत के प्रवर्तकों ने कोरे भाव के स्थान पर रस (भावोत्पादिनी शक्ति) को महत्व दिया है। |
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आत्मा सम्बन्धी वाद-विवाद काव्यशास्त्र के विभिन्न संप्रदाय काव्य की आत्मा काव्य की शक्ति |
काव्य की आत्मा |
सही उत्तर विकल्प (3) है → काव्य की आत्मा |